अभी अभी जन्मा है कवि

 बचवा , चल चील लगा दे !

रात , जी अकुलाता है
कैसा तो होता जाता है
 ससुरा रामदस्वा सरवा
अब तक रामचरित गाता है

रामदस्वा जल्दी सो जाए
ऐसा कोई ईलम लगा दे

 बचवा, अंडरवा आजा
होल से जर दे दरवाजा
राम-झरोखे पे लटका दे
तब तक ये बजरंगी धागा

हा अब सब कुछ सही है
फॅट से फायर फिलम लगा दे !

 

 

सौजन्य :अभी अभी जन्मा है कवि
  रचना:  राकेश रंजन 

राकेश रंजन
साकेटपुरी, आर एन कॉलेज के समीप
बड़ी युस्सूफपुर
हाजीपुरवैशाली
बिहार -८४४१०१

अभी अभी जन्मा है कवि७० से उपर कविताओ का संग्रह है
इसका प्रकाशन, “प्रकाशन संस्थाननयी देल्हीने किया है

चाय का स्वाद

वो चाय 
तुम्हारे हाथो से बनी

जिसकी चुस्की से
खुलती थी मेरी आँखें 
और शुरू होता था मेरा दिन

जीवंत है वो स्वाद 
जो भाता है आज भी 

हू तो दूर,
मगर हर रोज़ याद आती है वो 

चाय का  स्वाद

Published in: on May 18, 2008 at 11:56 am Comments (6)

मंगल-मंगल

धड़क-धड़क 
धड़के है जिया मेरा 
घूमड़-घूमड़ 
उड़े हैं  मेरा
मंगल-मंगल
हैं सब आस पास

क्यूंकी, 
हो तुम मेरे पास 
*******************************
सावन है अभी दूर,
फिर भी, दिल की चाहते है मजबूर
काटे है दिन

पर,
आजा कटे ना रतिया
****************************

Published in: on April 30, 2008 at 4:59 am Comments (0)
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**Celebrating International Women`s Day

 Source flickr (pic source: flickr)

तू ही प्रथम, तू ही जगजानी
तू ही प्रतक्ष प्रेरणारुपणी 
तू ही शक्ति, तू ही सहारा
तेरे बिन पौरुष अधमारा
तू निश्चल, निर्मल ममतामयी
तू कोमल और करुणामयी

पुरुष का पुरुषार्थ नही
धरती का यथार्थ नही
तू नही तो जीवन  नही

तेरे बिन सब कुछ अधूरा
तू है तो सब कुछ पूरा

तू ही यौवन, तू ही आकर्षण
तू ही सौंदर्य, तू ही 

प्रेम की परिभाषा है तू
क्या मैं तेरा वर्णन करू
शब्द नही मेरे पास,
जो तेरा अभिनंदन करू
है तुझपे सब कुछ अर्पण
मैं करूँ खुदको  समर्पण

International Women`s Day fall on 8th of March. 

See the ladies around you leaving out footprints in almost all fields, where society think they cant.

Published in: on March 5, 2008 at 2:48 pm Comments (2)
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छुपी है वो…… यादें

धूप की रोशिनी मे 
बागो के फूलो मे
चाँद की चाँदनी मे
घर की पूजा मे
प्राथमिक की परीक्षा मे
दशहरे के मेले मे 
परोस की सगाई मे
शादी की बिदाई मे
खेल के मैदान मे 
दादी की कहानियो मे
दौड़ की जीत मे

ठंड से रज़ाई मे

तालाब के किनारे पर
परोस की छत पर
पेड़ो की डाल पर
स्कूल के बेंच पर
क्लास की गेट पर
परोस की खिड़की तोड़ने पर
मोहल्ले की जान पर
कुलफी की चूस पर
साइकल की ज़िद पर
दीवाली की मिठाई पर
क्लास मे फर्स्ट पर
बहन से लड़ाई पर
पापा की डाट पर
मम्मी की दुलार पर
बहन से राखी पर
रात को खाने पर
टीवी के फिल्म पर

गलियारे में घूम करहोली में रंग पर
चुटकुले मे मगन पर
भोज के नाम पर
कॉमिक्स की बातो पर
छुट्टी के ख़याल पर
कार्टून के नाम पर
गर्मी की उमस पर
छत पर सोने पर
तारे गिनने मे
सप्तऋषि खोजने मे
स्कूल की गाड़ी छूट जाने मे

छुपी है वो यादें

Published in: on February 26, 2008 at 2:09 pm Comments (7)
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दादी की मीठी चिज्जी — दीपिका जोशी

दादी की मीठी चिज्जी
—दीपिका जोशी

एक दिन मुंबई के लोकल ट्रेन में सफ़र कर रही थी। दोपहर का समय था इसलिए ज़्यादा भीड़ नहीं थी, सो बैठने के लिए जगह भी मिल गई। सामने वाले बेंच पर एक बहुत ही बुड्ढी औरत बैठी थी। सारा बदन झुर्रियों से भरा, बिना दाँत का मुँह भी गोल-गोल, सफ़ेद बालों का सुपारी जितना जूड़ा, और हाथ में एक थैला था जिसमें चिप्स, नमकीन, कुछ मिठाइयों के पैकेट। शायद अपने नाती-पोतों के लिए ये सब चीज़ें ले जा रही हैं दादी जी… सोचकर ये बात बड़ी मज़ेदार लगी।
एक दो स्टेशन जाने के बाद वो दादी उठी, हाथ-पैर थरथर काँप रहे थे, बैठे हुए लोगों का कंधा और जो भी सहारा मिले, पकड़-पकड़कर आगे बढ़ने लगी। मैं हैरान तब हुई जब वह बुढ्ढी औरत अपनी धीमी गहराती आवाज़ में कहने लगी, ”चिप्स, मिठाई ले लो, अपने बच्चों को खुश करो।”

जब तक मेरे कान पर वो शब्द पड़े, दादी काफ़ी आगे निकल चुकी थी। वहाँ भी उसका चिप्स ले लो. . मिठाई ले लो. . .चल ही रहा था। मेरे मन में आया कि एक कोई चीज़ इससे ख़रीदनी चाहिए। लेकिन मुझे अगले स्टेशन पर उतरना था और वह औरत मुझसे काफ़ी दूर निकल गई थी। समय बहुत कम था, शायद उतनी देर में कोई चीज़ लेना और पैसे चुकता करना संभव नहीं था। फिर यह भी लगा कि ‘क्या करना अपना बोझ बढ़ा कर, पहले ही मेरा थैला समान से ठसा-ठस भरा हुआ है, और मैं चुप बैठी स्टेशन की राह देखने लगी। जहाँ मैं बैठी थी वहाँ से दूर दिखाई दिया कि एक आभिजात्य घराने की सी लगती महिला ने काफ़ी समान उससे ख़रीद कर उस दादी को जीवन-यापन के इस कठिन कार्य में मदद कर दी। वह देखकर मुझे अच्छा तो लगा, पर खुद को कोसती रही कि अगर मैंने भी दो प्यार भरे बोल बोल के उसकी दुखभरी ज़िंदगी में कुछ तो खुशी दी होती तो शायद मैं उस खुशी को ज़िंदगी भर अपने दिल में सँजो कर रख सकती।

आज भी मुझे उस दादी से मिलने की बड़ी ख्वाहिश है। उसके पास से चिज्जी ले कर अपने बेटे को ‘दादी की चिज्जी’ कहकर खिलाना चाहती हूँ क्योंकि बातों ही बातों में मैंने उसे दादी के बारे में काफ़ी बताया था (शायद यह सोचकर कि जो ग़लती मैंने की, मेरा बेटा आगे ज़िंदगी में न करें)। यदि आपको भी ऐसी दादी कहीं नज़र आए तो इधर-उधर कुछ भी सोचे बिना मदद का हाथ आगे बढ़ाएँगे ना? उसे जरूरत है हमारे दो मीठे बोलों की, मदद के हाथों की, शायद सहानुभूति उस जैसी खुद्दार को पसंद ना भी आए। मैंने ग़लती की है, आप न करिए!!

Published in: on September 23, 2007 at 9:29 am Comments (1)

**प्यारा-सा वसंत**

सुबह की प्यारी धूप,    

और हल्की हल्की ठंड |

चारों ओर हरयाली,

और पीले पीले रंग |

शरद से गृष्म ऋतु के बीच प्यारा-सा वसंत ||

Published in: on February 3, 2007 at 1:12 pm Comments (1)

पल

हो दूर तुम मुझसे, लेकिन ख्यालो में हो पास  |

हर पल है मुझे, उन बीते हुए हर पल का एह्सास ||

कभी किसी और बात से मन को बहलाना, तो कभी मन की उमंगो को जुबा पर न लाना |

दिल की बात चेहरे पर झल्कती थी, और वो मुस्कान मासाअल्लाह कत्ल करती थी||

खुशी होती है सोच कर कि कभी पास थे तुम,  जीवन के कुछ पल में साथ थे तुम ||

Published in: on November 21, 2006 at 3:25 pm Comments (1)

I don’t know why…

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…Don’t Know why

I Don’t know why…Why in a scary night and in a heavy rain…
My thoughts always turn to you…

Even If someone holds my hand…
I look back for you….

Even If I imagine someone else in my Dreams…
It comes out to be you….

Even If I don’t know where this path will take me to…
I know it will take me to you…

Even If I don’t know what this stars has stored for me….
I know it would be you and only you…..

Even If I am miles an miles away from you……
with every breathe I find you…..

I don’t know why….Why my thoughts always turns back to you…
In a scary Night and in a heavy rain…I look for you….

I don’t know why…Why my thoughts turn to you…..

- By Sis

Published in: on October 6, 2006 at 11:09 am Comments (2)

िख्डकी

Arzz Hai :)

िख्डकी से देखा, तो बाह्र सड्क पर कोई नही था |

बाह्र सड्क पे जा कर िख्डकी को देखा तो सच मे कोई नही था ||

Great PJ!!!!!!!!! :)

Published in: on September 23, 2006 at 11:35 am Comments (2)