आ बचवा , चल चीलम लगा दे !
रात भई, जी अकुलाता है
कैसा तो होता जाता है
उ ससुरा रामदस्वा सरवा
अब तक रामचरित गाता है
रामदस्वा जल्दी सो जाए
ऐसा कोई ईलम लगा दे
आ बचवा, अंडरवा आजा
होल से जर दे दरवाजा
राम-झरोखे पे लटका दे
तब तक ये बजरंगी धागा
हा अब सब कुछ सही है
फॅट से फायर फिलम लगा दे !
सौजन्य :अभी अभी जन्मा है कवि
रचना: राकेश रंजन
राकेश रंजन
साकेटपुरी, आर एन कॉलेज के समीप
बड़ी युस्सूफपुर
हाजीपुर, वैशाली
बिहार -८४४१०१
अभी अभी जन्मा है कवि, ७० से उपर कविताओ का संग्रह है
इसका प्रकाशन, “प्रकाशन संस्थान, नयी देल्ही” ने किया है





