नौकरी जोइन करने मैं अभी दो महीने और बाँकी थे|
सुबह का नाश्ता करके, छ्त पर राकेश भ्इया के साथ जा बैठा|भैया अपनी कविता पुरी करने में लगे थे| मेरी नजर पास रखी किताब पर गयी|
किताब का नाम पढ कर कुछ अजीब सा लगा| नाम था –” एक पैग पटियाला और युनिभर्सिटी कैम्पस “|
अब ये पैग-पटियाला कुछ समझ में नहीं आया|
सोचा क्युँ ना पढ कर देखी जाये|
दिल्ली युनिभर्सीति में साथ पढने वाले कुछ मित्रगण अपने एक मित्र के रूम पर बीर की पार्टी रखते है|
मित्र-मँडलि में तीन चार लडके और तीन लड्किया है|
बातो-बातो में किन्ही एक ऐसे सखस की चर्चा होती है, जो की उनमें से एक के प्रेणास्रोत हैं| जिन्होने सबो की मदद् की थी युनिभर्सिती में|
पुरी कहानी उसी सख्श के दिल्ली युनिभर्सिती में बीते पलो को सजोय है| कहानी का अंत थोडा अलग है, पर दिल को छुता है|