” एक पैग पटियाला और युनिभर्सिटी कैम्पस ”

नौकरी जोइन करने मैं  अभी दो महीने और बाँकी थे|  
सुबह का नाश्ता करके, छ्त पर  राकेश भ्इया के साथ जा बैठा|भैया अपनी कविता पुरी करने में लगे थे|  मेरी नजर पास रखी किताब पर गयी|

किताब का नाम पढ कर कुछ अजीब सा लगा| नाम था –” एक पैग पटियाला और युनिभर्सिटी कैम्पस “|

अब ये पैग-पटियाला कुछ समझ में नहीं आया|
सोचा क्युँ ना पढ कर देखी जाये|

दिल्ली युनिभर्सीति में साथ पढने वाले कुछ मित्रगण अपने एक मित्र के रूम पर बीर की पार्टी रखते है|
मित्र-मँडलि में तीन चार लडके और तीन लड्किया है|
बातो-बातो में किन्ही एक ऐसे सखस की चर्चा होती है, जो की उनमें से एक के प्रेणास्रोत हैं| जिन्होने सबो की मदद् की थी युनिभर्सिती में|
पुरी कहानी उसी सख्श के दिल्ली युनिभर्सिती में बीते पलो को सजोय है| कहानी का अंत थोडा अलग है, पर दिल को छुता है|

Published in: on October 29, 2007 at 2:30 pm

The URI to TrackBack this entry is: http://amijha.wordpress.com/2007/10/29/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%8d/trackback/

RSS feed for comments on this post.

Leave a Comment